रूपकुंड झील: जहाँ पड़े हैं अनगिनत नरकंकाल

1153

roopkund 1
उत्तरांचल के चमोली ज़िले के सीमान्त देवाल विकास खांड में समुद्र तल से 16200 फुट की ऊंचाई पर स्थित प्रसिद्ध नंदादेवी राजजात यात्रा मार्ग पर नंदाकोट, नंदाघाट और त्रिशूल जैसे विशाल हिम पर्वत शिखरों की छांव में चट्टानों तथा पत्थरों के विस्तार के बीच फैला हुआ प्रकृति का अनमोल उपहार एवं अद्वितीय सौन्दर्य स्थान रूपकुंड एक ऐसा मनोरम स्थल है जो अपनी स्वास्थ्यवर्धक जलवायु, दिव्य, अनूठे रहस्यमय स्वरूप और नयनाभिराम दृश्यों के लिए जाना जाता है। यह रूपकुंड झील त्रिशूली शिखर (24000 फीट) की गोद में ज्यूंरागली पहाड़ी के नीचे 150-200 फीट ब्यास (60 से 70 मीटर लम्बी), 500 फीट की परिधि तथा 40 से 50 मीटर गहरी हरे-नीले रंग की अंडाकार (आंख जैसी) आकृति में फैली स्वच्छ एवं शांत मनोहारी झील है। इससे रूपगंगा जलधारा निकलती है। अपनी मनोहारी छटा के लिये यह झील जिस कारण अत्यधिक चर्चित है वह है झील के चारों ओर पाये जाने वाले रहस्यमय प्राचीन नरकंकाल, अस्थियां, विभिन्न उपकरण, कपड़े, गहने, बर्तन, चप्पल एवं घोड़ों के अस्थि-पंजर आदि वस्तुऐं।
यहाँ पर गर्मियों मैं बर्फ पिघलने के साथ ही कही पर भी नरकंकाल दिखाई देना आम बात हैं। यहाँ तक कि झील के अंदर देखने पर भी तलहटी मैं भी नरकंकाल पड़े दिखाई दे जाते हैं। इन कंकालों को 1942 में नंदा देवी शिकार आरक्षण रेंजर एच. के. माधवल, ने पुनः खोज निकाला, यद्यपि इन हड्डियों के बारे में आख्या के अनुसार वे 19वीं सदी के उतरार्ध के हैं। इससे पहले विशेषज्ञों द्वारा यह माना जाता था कि उन लोगों की मौत महामारी भूस्खलन या बर्फानी तूफान से हुई थी। 1960 के दशक में एकत्र नमूनों से लिए गये कार्बन डेटिंग ने अस्पष्ट रूप से यह संकेत दिया कि वे लोग 12वीं सदी से 15वीं सदी तक के बीच के थे।
roopkund
यात्री के लिए रूपकुंड जाने के कई रास्ते हैं। आम तौर पर, ट्रेकर और रोमांच प्रेमी सड़क मार्ग से लोहाजुंग या वान की यात्रा करते हैं। वहां से, वे वान में एक पहाड़ी पर चढ़ते है और रन की धर पहुंचते हैं। वहां कुछ समतल क्षेत्र है जहां ट्रेकर रात को शिविर लगा सकते हैं। अगर आसमान साफ हो, तो व्यक्ति बेदनी बग्याल और त्रिशूल देख सकता हैं। अगला शिविर स्थान है बेदनी बग्याल, जो वान 12-13 किमी दूर है पर है। वहां खच्चरों, घोड़ो और भेड़ो के लिए एक विशाल चरागाह है। वहां दो मंदिर और एक छोटी झील है जो उस जगह की खूबसूरती को बढ़ाता है। व्यक्ति बेदनी बग्याल पुल से हिमालय की कई चोटियों को देख सकता हैं। इसके बाद ट्रेकर भागुवाबासा तक पहुंचता है, जो बेदनी बग्याल से 10-11 किमी दूर है। भागुवाबासा का जलवायु वर्ष के अधिकांश समय प्रतिकूल रहता है। व्यक्ति को त्रिशूल और 5000 मीटर से अधिक ऊंची अन्य चोटियों को करीब से देखने का अवसर मिलता है। आसपास के पहाड़ों की गहरी ढलानों पर कई झरने और भूस्खलन देखने को मिलते हैं। भागुवाबासा से, ट्रेकर या तो रूपकुंड जाकर वापस आते हैं या वे जुनारगली कर्नल पास, जो झील के थोड़ी ही ऊपर है, से होते हुए शिल समुन्द्र (पत्थरों का महासागर) जाते हैं और फिर वे होमकुंड तक ट्रेक के द्वारा आगे बढ़ते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here