राजनीति और आध्यात्म का ऐतिहासिक सम्मिलन

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प्राचीन भारत में राजनीति और आध्यात्म एक दूसरे के पूरक माने जाते थे। उस समय राजपुरोहित, शासकों को नैतिक मार्ग पर चलने के लिए परामर्श देते थे और यही कारण था की रामराज्य के चरितार्थ होने में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के साथ-साथ गुरु वशिष्ठ की भी महती भूमिका थी। इसी प्रकार राजा जनक को भी ‘अष्टावक्र’ जैसे मनीषी के तो वहीं राजा बिम्बिसार को महात्मा बुद्ध जैसे गुरु का सानिध्य मिला। सम्राट अकबर भी विभिन्न धर्मों के विद्वानों के साथ विचार विमर्श करते थे और इसका प्रभाव उनके ‘सर्वधर्म समभाव’ वाले शासन काल से परिलक्षित होता है।
आज पुनः हमारे गौरवशाली इतिहास को दोहराये जाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। पुरे विश्व में छाप छोड़ने वाले हमारे पराक्रमी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी और पुरे विश्व को अपना परिवार मानने वाले आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर जी एक ही उद्देश्य “संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्” अर्थात हम एक साथ चलें, एक साथ बोलें, हमारे मन एक हों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। ध्यातव्य है कि इस आदर्श वाक्य का उल्लेख माननीय प्रधानमंत्री जी ने 31 जनवरी 2016 को ‘मन की बात’ नामक कार्यक्रम में भी किया था। यह शुभ संकेत है कि इन दोनों ऐतिहासिक महापुरुषों में एक अद्भुत समन्वय और सहयोग का भाव भी परिलक्षित होता है। हम इस सहयोग और समन्वय की एक झलक 11, 12 और 13 मार्च 2016 को दिल्ली में आयोजित होने वाले ‘विश्व सांस्कृतिक महोत्सव’ के विश्व – पर्व में भी देख सकते हैं जिसमें दोनों दिव्य – पुरुष एक मंच पर होंगे और विश्व शांति, समृद्धि और भाईचारे का जीवंत सन्देश प्रसारित करेंगे। इस महोत्सव में विश्व की अनेक संस्कृतियों का मिलन देखने को मिलेगा जो एक विश्व – कुंभ की तरह होगा। दुनिया के प्रत्येक कोने से आने वाले 8500 गायक – गायिकाएं एवं 35000 नर्तक – नर्तकियाँ अपनी प्रस्तुतियाँ 7.5 एकड़ के विशालकाय मंच पर देंगे। इन प्रस्तुतियों को देखने एवं इस विश्व-कुम्भ में का हिस्सा बनने के लिए दुनिया के 155 देशों से 35 लाख लोग आ रहे। ये लोग गुरु श्री श्री रविशंकर जी के नेतृत्व में विश्व शांति के लिए ध्यान भी करेंगे। विश्व शांति के लिए जहाँ गुरु श्री श्री रविशंकर जी आध्यात्मिक तरीके से प्रयास कर रहे वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के राजनैतिक प्रयासों को भी पूरा विश्व देख रहा।
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अन्ततः हम कह सकते हैं कि आने वाले समय में रामराज्य जैसे आदर्श राष्ट्र और समाज की स्थापना में इन राजनीतिक और आध्यात्मिक महापुरुषों के साझा प्रयास अवश्य फलीभूत होंगे। और पुनः यह बात स्थापित हो सकेगी कि राजनीति और आध्यात्म एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक होते हैं।
आइये हम सभी इस ‘दिव्य समाज निर्माण’ के सहभागी बनें।

प्रेषक
विष्णु धानुका
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