किन्नरों की शवयात्रा देखेंगे तो रो पड़ेंगे

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kinnar
आज किन्नर जैसा कोई देश नहीं है लेकिन किन्नर देश में रहते जरूर हैं। किन्नरों का अस्तित्व दुनिया के हर देश में है समाज में उनकी पहचान भी है फिर भी उन्हें आम इंसानों की तरह नहीं समझा जाता, उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता, उन्हें सरकार कोई आरक्षण नही देती, व्यवसायी वर्ग उन्हें नौकरी नहीं देता और तो और गाने बजाने और नाचने के अलावा कोई उनसे दोस्ती नहीं करता, उनसे बात नहीं करता क्योंकि वो समाज में हेय दृष्टि से देखे जाते हैं मानो वो कोई परग्रही हों आखिर क्यों किन्नर एक अजूबा है? क्यों उन्हें इस तरह सामाजिक तिरस्कार झेलना पड़ता है। क्यों समाज उनके प्रति लचीला रुख नहीं अपनाता? सवाल बहुत से हैं लेकिन उत्तर नहीं।


पौराणिक काल के काफी बाद महाभारत काल में भी अपने अज्ञातवास में अर्जुन का वृहन्नला का रूप धरना भी यही साबित करता है कि उभयलेंगिकों के लिए समाज में पर्याप्त स्थान था। महाभारत का ही शिखंडी जो नारी रूप में पैदा हुआ लेकिन एक पुरुष के रूप में पला और बढ़ा। परंतु आज समाजिक विभेद के कारण ये समाज अपने पक्ष से भटक रहा है। आवश्यकता है एक पहल की ताकी इन्हें भी समाज की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके।

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किन्नरों के बारे में कई प्रकार की रस्मे आज भी हमारे समाज में मौजूद है, जैसे कि हिंजड़ों की शव यात्राएं रात्रि को निकाली जाती है। शव यात्रा को उठाने से पूर्व जूतों-चप्पलों से पीटा जाता है। शव को घसीटते हुए शमशान तक ले जाते हैं | ऐसा करने के पीछे उनका मानना है कि ऐसा करने से पुनः किन्नर के रूप में जन्म नहीं मिलता | किन्नर के मरने उपरांत पूरा हिंजड़ा समुदाय एक सप्ताह तक भूखा रहता है।

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