नवरात्रि के प्रथम दिन करें माँ शैलपुत्री की पूजा

263

mata shailputri
शुक्रवार आठ अप्रैल यानी आज से हिंदू नववर्ष प्रारम्भ हो रहा है , साथ ही इस दिन से चैत्र शुक्ल पक्ष का पहला नवरात्र होने के कारण इस दिन कलश स्थापना की जाएगी। नवरात्री के नौ दिनों में माता के नौ रुपों की पूजा करने का विशेष विधि विधान है, लेकिन इस बार आठ दिनों की नवरात्रि होगी। इन दिनों में जप-पाठ, व्रत- अनुष्ठान, यज्ञ-दानादि शुभ कार्य करने से व्यक्ति को पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। माँ दुर्गा पहले स्वरूप में ‘शैलपुत्री’ के नाम से जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है।
माँ भगवती शैलपुत्री का वाहन वृषभ है, उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है| इस स्वरूप का पूजन नवरात्री के प्रथम दिन किया जाता है| सभी देवता, राक्षस, मनुष्य आदि इनकी कृपा-दृष्टि के लिए लालायित रहते हैं| किसी एकांत स्थान पर मृत्तिका से वेदी बनाकर उसमें जौ, गेहूं बोएं और उस पर कलश स्थापित करें | मूर्ति स्थापित कर, कलश के पीछे स्वास्तिक और उसके युग्म पा‌र्श्व में त्रिशूल बनाएं| माँ शैलपुत्री के पूजन से योग साधना आरंभ होती है| जिससे नाना प्रकार की उपलब्धियां प्राप्त होती हैं |

शैलपुत्री पूजा विधि-

चैत्र नवरात्र पर कलश स्थापना के साथ ही माँ दुर्गा की पूजा शुरू की जाती है| पहले दिन माँ दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है| दुर्गा को मातृ शक्ति यानी स्नेह, करूणा और ममता का स्वरूप मानकर हम पूजते हैं| माँ शैलपुत्री की पूजा में सभी तीर्थों, नदियों, समुद्रों, नवग्रहों, दिक्पालों, दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता सहित सभी योगिनियों का कलश पर विराजने के लिए प्रार्थना कर आवाहन किया जाता है | कलश में सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, मुद्रा सादर भेट किया जाता है और पंच प्रकार के पल्लव से कलश को सुशोभित किया जाता है|

कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ बोये जाते हैं जिन्हें दशमी तिथि को काटा जाता है और इससे सभी देवी-देवता की पूजा होती हैI “जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नामोस्तुते” मंत्र से पुरोहित यजमान के परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर जयंती डालकर सुख, सम्पत्ति एवं आरोग्य का आर्शीवाद देते हैं|

कलश स्थापना के बाद देवी दु्र्गा जिन्होंने दुर्गम नामक प्रलयंकारी असुर का संहार कर अपने भक्तों को उसके त्रास से यानी पीड़ा से मुक्त कराया उस देवी का आह्वान किया जाता है कि ‘हे मां दुर्गे’ हमने आपका स्वरूप जैसा सुना है उसी रूप में आपकी प्रतिमा बनवायी है आप उसमें प्रवेश कर हमारी पूजा अर्चना को स्वीकार करें| माँ देवी दुर्गा ने महिषासुर को वरदान दिया था कि तुम्हारी मृत्यु मेरे हाथों हुई है इस हेतु तुम्हें मेरा सानिध्य प्राप्त हुआ है अत: मेरी पूजा के साथ तुम्हारी भी पूजा की जाएगी इसलिए देवी की प्रतिमा में महिषासुर और उनकी सवारी शेर भी साथ होता है|

माँ दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल पर बीच में स्थापित की जाती है और उनके दोनों तरफ यानी दायीं ओर देवी महालक्ष्मी, गणेश और विजया नामक योगिनी की प्रतिमा रहती है और बायीं ओर कार्तिकेय, देवी महासरस्वती और जया नामक योगिनी रहती है तथा भगवान भोले नाथ की भी पूजा की जाती है| प्रथम पूजन के दिन “शैलपुत्री” के रूप में भगवती दुर्गा दुर्गतिनाशिनी की पूजा फूल, अक्षत, रोली, चंदन से होती है|इस प्रकार दुर्गा पूजा की शुरूआत हो जाती है प्रतिदिन संध्या काल में देवी की आरती के समय “जग जननी जय जय” और “जय अम्बे गौरी” के गीत भक्तजनो को गाना चाहिए|

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here