इरफ़ान के बयान का सबसे सटीक विश्लेषण रुद्रेन्द्र अवस्थी की कलम से

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rudendra
इरफ़ान खान की अगली फिल्म आने वाली है मदारी. उन्होंने जयपुर में फिल्म का प्रमोशन किया. बात यहां प्रमोशन की नहींहै. बात है उनकी बेबाकी की. उन्होंने वहां ईद-उल-जुहा यानि बकरीद पर अपने ख्यालात पेश किये और हंगामा हो गया.इरफान खान ने कहा, “कुर्बानी का मतलब अपनी कोई अजीज चीज कुर्बान करना होता है. ये नहीं कि बाजार से आप कोई दो बकरे खरीद लाए और उनको कुर्बान कर दिया.”इरफान खान ने एक बात और कही जिसके लिए सबको सोचना चाहिए वो भी अपनी भावनाओं कोताक में रखकर. इरफान ने कहा, “हमारे जो भीत्योहार हैं, उनका मतलब हमें वापस से समझना चाहिए कि वे किसलिए बनाए गए हैं. सौभाग्य है कि ऐसे देश में रह रहा हूं जहां हर धर्म का सम्मान होता है.”बकरीद को लेकर मैंने खुद अपने आसपास कहते और करते देखा है कि जुम्मन मियां दो बकरे लाए हैं. इस बार दो बकरों पर कुर्बानी होगी. अभी जो घर में बैठे असलम मियां ये सुन रहे थे, बड़ी ही गर्मजोशी में बोले, अजी हम क्या जुम्मन से कम हैं? वो दो बकरे लाए हैं तो हम तीन लाएंगे. बात हमारी ही जमेगी कि असलम के घर तीन बकरों पर कुर्बानी हुई है. तभी कही और जिक्र होता कि अबके असलम के घर जुम्मन से ज्यादा बकरे कुर्बान हो रहे हैं तभी कोई वहां बुजुर्ग बताते. अजी उनकी क्या है दो करें या तीन, खूब हराम की कमाई आ रही है. अब आप ही सोचिये क्या मकसद होता जा रहा है त्योहार का. एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए न जाने कितने बकरे ऐवईं कुर्बान कर दिए जाते हैं. इस सबको देखकर मुझे लगता क्या कुर्बानी अपनी शान दिखाने के लिए है ? या फिर कोई और मकसद है ? सवाल ये भी है कि जिन गरीबों के घर बकरे नही कटते क्या अल्लाह उनका ख्याल नहीं रखता ?हद तो तब होती थी जब उन तीन बकरों का मीट थोड़ा बहुत ही किसी को दिया जाता था. बाकीसब घर के फ्रिज में, रोजाना करीब 15 दिन तक उसके कबाब बन रहे हैं तो कभी फ्राई किया जा रहा है. लगता कुर्बानी नहीं हुई बल्कि जायके का तड़का लगा है. जबकि होना ये चाहिए कि अपने अलावा ये मीट गरीबों, रिश्तेदारों में बांटा जाता. अब आप ही बताओ ये कौन सी कुर्बानी है. फिर काहे चिल्ला रहे हो इरफ़ान ने भावना को आहत किया है.अपनी भावना का तो तुम्हे बेहद ख्याल है मगर कभी उसकी भावना का ख्याल किया है, जिसके लिए तुम कहते हो कि अल्लाह के लिए कुर्बानी कर रहे हैं. अल्लाह को तुम्हारी ऐसी कुरबानी की जरूरत नहीं है.नियत सुधार लो नहीं तो सारे बकरे जुम्मनऔर असलम के चक्कर में बेकार चले जाएंगे. मकसद ये नहीं कि किसी की भावना को आहत किया जाए. सलाह इस बात की है कि हर त्योहार पर गौर और फ़िक्र की जाए. हम जो अपने त्योहारों को बनाते जा रहे हैं, उनका मकसद क्या ये ही है ? सबसे अफ़सोस कीबात ये है जब कोई बात करना चाहता है तो उसे गालियों से नवाज दिया जाता है जैसा अब लोग इरफान के साथ करेंगे. बकरे कुर्बान करने से पहले अगर अपनी गालियों को खत्म कर दो तो ये आपके लिए न सही आपके धर्म के लिए सही होगा, जिसके तुम सच्चे आशिक बनते हो. लेकिन तुम क्या हो ये तुम अच्छे से जानते हो. बकरे खरीद कर तो कुर्बान कर सकते हो, क्योंकि वो पैसे से मिल जाते हैं, लेकिन अपनी गलत हरकतों में सुधार नहीं कर सकते, क्योंकि उसमें यकीनन आपको अपने नफ्स की ख्वाहिशों को कुर्बान करना पड़ेगा.फ्रिज में बकरे काट कर रख देने से दुआए कुबूल नहीं होंगी, वो भी तब, जब आपके पड़ोस या बस्ती में दो वक्त की रोटी का इंतजाम कोई परिवार मुश्किल से कर पाता हो.और क्या बोले इरफान जिसका हो रहा विरोध?इरफान कुर्बानी की साफ नियत तक ही नहीं बोले बल्कि उन्होंने रोजे और मोहर्रम को लेकर भी विवादित बयान दिया. इरफान ने कहा रोजा रखना सिर्फ भूखे रहना नहीं होता, बल्कि आत्मचिंतन करना होता है. मुहर्रम दुःख मनाने वाला है, लेकिन लोगों ने उसे सर्कस बना दिया है. साथ ही मुसलमानों के लिए कहा कि इस्लाम के नाम पर दहशतगर्दी के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाते.क्या बोले उलेमा ?धार्मिक मामलों में इरफान की दखल अंदाजी मुस्लिम धर्मगुरुओं को पसंद नहीं आई. जमीयत उलेमा ए हिन्द ने कहा कि इरफ़ान एक्टर हैं और एक्टिंग करें. धर्म के बारे में न बोलें. जमीयत उलेमा ए हिन्द के स्टेट जनरल सेक्रेटरी मौलाना अब्दुल वाहिद खत्री ने कहा इरफान ये सब पब्लिसिटी के लिए कर रहे हैं. खालिद उस्मानी ने कहा कि इरफान को इस्लाम का ज्ञान नहीं है, इसलिए चुप रहें तो बेहतर है.

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