साक्षी के जज्बे और जूनून ने हारी हुई बाजी पलटकर भारत को दिलाया पहला पदक

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  कहानी फ़िल्मी नहीं लेकिन जिस तरह ये अंजाम तक पहुंची, उससे बॉलीवुड के कई फ़िल्ममेकर प्रेरणा ले सकते है.

रियो ओलंपिक में साक्षी मलिक ने हारकर जीतने का करिश्मा कर दिखाया.

साक्षी ने रियो में तिरंगा लहराया और भारतीय समय के मुताबिक़ रात करीब पौने तीन बजे हज़ारों किलोमीटर दूर हरियाणा के रोहतक में जश्न शुरु हो गया. रोहतक में टीवी पर कुश्ती देखने वाले साक्षी के माता-पिता झूमने और नाचने लगे.

हालांकि इतिहास साक्षी के साथ नहीं था. ओलंपिक में पहले कभी किसी भारतीय महिला पहलवान ने पदक नहीं जीता था.

रियो ओलंपिक में 11 दिन के दौरान भारत के खाते में कोई पदक नहीं आया था. पदक की उम्मीद जगाने वाले दिग्गज शूटर, बैडमिंटन और टेनिस स्टार हारकर बाहर हो चुके थे.

भारत को सम्मोहित करने वाली दीपा कर्मकार ने भी हौसला भरपूर दिखाया लेकिन उनके हाथ से भी पदक फिसल चुका था.

साक्षी को भी 58 किलोग्राम भारवर्ग कुश्ती मुक़ाबले के क्वार्टर फाइनल में झटका लग चुका था. उन्हें रुस की पहलवान वलेरिया कोबलोवा ने हरा दिया था.

 

लेकिन, फिर अचानक क़िस्मत पलटी. रूसी खिलाड़ी फाइनल में पहुंच गईं और साक्षी के सामने कांसे का तमग़ा जीतने का रास्ता खुल गया.

मंज़िल आसान नहीं थी. रेपचेज़ राउंड-2 को उन्होंने आसानी से जीत लिया लेकिन प्लेऑफ मुक़ाबले में बाज़ी पलटती दिखी.

लगातार मुक़ाबले खेलकर साक्षी थकी हुई दिख रही थीं. दूसरी तरफ कर्गिस्तान की पहलवान आइसूलू टाइनेकबेकोवा उन पर हावी नज़र आ रहीं थीं.

एक वक़्त कर्गिस्तान की पहलवान ने 5-0 की बढ़त बना ली थी. उस वक़्त लगा कि पदक साक्षी के क़रीब आकर दूर चला गया.

लेकिन वो ये बाज़ी गंवाने को तैयार नहीं थीं. ब्रेक के बाद उन्होंने नए सिरे से शुरुआत की. एक दांव ऐसा लगाया कि उन्हें चार अंक मिल गए. पर साक्षी अब भी पीछे थीं.

इसके बाद उन्होंने एक और अंक हासिल किया. अब दोनों पहलवान बराबरी पर थे.

तब तक कर्गिस्तान की पहलवान डिफेंसिव हो चुकी थीं लेकिन साक्षी आक्रामक थीं. उन्होंने दो अंक और जुटाए. आखिरी सैकेंडों में उन्होंने एक और अंक जुटाया और कांसे का तमग़ा भारत के नाम कर दिया.

ओलंपिक गए सौ से ज्यादा एथलीटों के भारतीय दल में साक्षी का नाम भले ही ज्यादा चर्चित न रहा हो लेकिन जानकारों को उनसे पदक की उम्मीदें थीं.

 

इसकी वजह थीं उनकी कामयाबियां. रोहतक की इस पहलवान ने साल 2014 के ग्लॉस्गो कॉमनवेल्थ खेलों में रजत पदक जीत हासिल किया था. साल 2015 में उन्होंने एशियन चैंपियनशिप में कांस्य जीता था.

उन्होंने इंस्ताबुल में पूर्व वर्ल्ड चैंपियन को हराकर रियो ओलंपिक का टिकट हासिल किया था.

साक्षी हरियाणा से हैं. हरियाणा उन राज्यों में है जहां पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं की संख्या सबसे कम है लेकिन उन्होंने तमाम सामाजिक अड़चनों के परे जाकर साल 2002 से कुश्ती की कोचिंग शुरु की और चौदह साल बाद भारतीय महिला कुश्ती का इतिहास बदल दिया.

कांस्य पदक हासिल करते ही साक्षी सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगीं. वो ट्विटर ट्रेंड में टॉप पर पहुंच गईं.

 

खेल मंत्री विजय गोयल ने उन्हें ट्विटर पर बधाई देते हुए लिखा, “साक्षी मलिक को बधाई. उन्होंने रियो 2016 में भारत के लिए पहला कांस्य पदक जीता.”

विदेश राज्यमंत्री जनरल (रिटा) वीके सिंह ने ट्विटर पर लिखा, “इंतज़ार ख़त्म हुआ. साक्षी मलिक ने हमें गौरवान्वित किया. हमारा पहला पदक. महिला कुश्ती में कांस्य.”

क्रिकेटर रविचंद्रन अश्विन ने ट्विटर पर लिखा, “साक्षी मलिक ने भारत को गौरवान्वित किया. भारत में कुश्ती को एक और बड़ा बूस्ट मिला.”

ये बधाइयां साक्षी हैं कि हरियाणा के रोहतक जिले की इस पहलवान ने रियो में भले ही कांसा जीता हो, लेकिन उनका नाम भारतीय कुश्ती के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिख गया है.

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