गंगा में विसर्जित करने के लिए PAK से भारत लाई गईं 160 हिन्दुओं की अस्थियां

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कराची के प्रसिद्ध पंचमुखी हनुमान मंदिर के मुख्य पुजारी रामनाथ मिश्र महराज के नेतृत्व में गुरुवार की शाम एक दल पाकिस्तान से 160 हिंदुओं की अस्थियां लेकर वाघा बॉर्डर पहुंचा. मुख्य पुजारी को पहले इन अस्थियों को लेकर दिल्ली आना था, लेकिन वीजा नहीं मिल पाने के कारण वह अस्थियों को दिल्ली के श्री देवोत्थान सेवा समिति के सदस्य विजय शर्मा और उनके 20 सदस्यीय दल को सौंपकर हरिद्वार के लिए रवाना हो गए.

देह की राख मां गंगा के चरण स्पर्श करे, इस धार्मिक मान्यता व संवेदनाओं को भीतर संजोकर जीवन यात्रा पूरी करने से पहले अपनी अंतिम इच्छा परिजनों को बताकर प्रभु चरणों में लीन होने वाले लोगों के लिये अस्थि विसर्जन मोक्ष प्राप्ति का द्वार माना गया है। एेसे ही पाकिस्तानी हिंदुओं के मृत परिजनों की मोक्ष प्राप्ति के लिए कराची स्थित श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर के मुखिया रामनाथ मिश्रा भगीरथ बन भारत पहुंचे। सीमाओं के बंधन के कारण जो वहां स्थित हिंदू न कर सके, रामनाथ ने कर दिखाया।

 

विभाजन की रेखा के चलते पाकिस्तान में बसे हिंदू अपने परिजनों को अंतिम विदाई देने के लिए सीमा के इस पार नहीं पहुंच पाए। इन हिदुओं ने बिछड़ चुके अपने परिजनों को पाकिस्तान वाघा सीमा में पुष्प भेंट कर श्रद्धासुमन भेंट किए।

दिल्ली में एक हफ्ते पितृपक्ष का पूजा पाठ
दिल्ली की गैर सरकारी संगठन श्री देवोत्थान सेवा समिति के लोग अस्थियां लेकर दिल्ली गये। वहां लगभग एक हफ्ते पितृपक्ष का पूजा पाठ करने के बाद और भी जगहों से आए हुए अस्थियों को एकत्र करके 23 सितंबर को अस्थि‍ कलश यात्रा लेकर हरिद्वार के लिए रवाना होंगे।

केवल हरिद्वार, कोलकाता का मिला वीजा
गौरतलब है कि पंचमुखी हनुमान मंदिर के मुख्य पुजारी रामनाथ मिश्र महाराज, शिष्य कबीर और उनके परिवार के लोग 160 हिन्दू लोगों की अस्थियों को पहले दिल्ली लाकर, पूजा-पाठ कर अस्थियों को विसर्जन करने अस्थि कलश यात्रा के साथ हरिद्वार जाना चाहते थे, लेकिन उनमें से सिर्फ पुजारी रामनाथ मिश्र महाराज और उनके शिष्य कबीर को हरिद्वार और कोलकाता का वीजा मिल पाया है।

विसर्जन पवित्र नदी   में ही क्यों
मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि मां गंगा सभी नदियों में से पवित्र हैं। इसके जल को छूने मात्र से सभी पाप धुल जाते हैं। इसका जल ऐसा होता हैं कि चाहे जितना बड़ा पापी हो। उसकी अस्थियों को इसके जल में डालने से उसे मोक्ष की प्राप्ति होती हो। मोक्ष के लिए हरिद्वार, प्रयाग और गंगासागर इन तीनों स्थानों में दुर्लभ है। अगर आप उत्तम गति की इच्छा रखते हैं, तो गंगा नदी की तरह कोई दूसरी गति नहीं हैं।

पाक के श्मशानघाटों में 10 वर्षों से रखी थीं अस्थियां

पाकिस्तान के विभिन्न श्मशानघाटों में पिछले 2 से 10 वर्ष तक रखी अस्थियां कराची स्थित श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर में इकट्ठी की गईं। इनमें कराची के गुज्जर बरियन मंदिर से भी अस्थियां लायी गयीं। श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर के मुखिया रामनाथ मिश्रा 160 हिंदुओं की अस्थियां लेकर अंतर्राष्ट्रीय वाघा सड़क सीमा से भारत में प्रवेश हुए। उल्लेखनीय है कि कराची व शक्कर में जलघाट में कई हिंदुओं की अस्थियां प्रवाह की जाती हैं, लेकिन कुछ हिंदू हरिद्वार में ही अपनी अस्थियों को प्रवाह करने की अंतिम इच्छा प्रकट करते हैं। उनकी इच्छा की पूर्ति के लिए वह अस्थियां लेकर यहां आए हैं।

हरिद्वार में पुरोहित को बताएंगे नाम, गोत्र
मिश्रा ने बताया कि वह हरिद्वार में अस्थियों को हिंदू धर्म की रीति के अनुसार विसर्जित करेंगे। जिन लोगों की यह अस्थियां हैं उनके परिजनों ने उन्हें गोत्र व हरिद्वार में उनके पुरोहित का नाम बताया है। वह इन्हीं पुरोहितों के माध्यम से अस्थियों का विसर्जन मंत्रोच्चारण के साथ करेंगे। साथ ही हरिद्वार में उनके परिजनों के नाम भी दर्ज करवाएंगे। उन्होंने कहा कि दिल्ली की कुछ संस्थाएं इस काम के लिए मदद कर रही हैं। वाघा में अस्थियों को विदाई देने के लिए हिंदू पहुंचे हुए थे। अभी भी पाकिस्तान के श्मशानघाटों में 40 हिंदुओं की अस्थियां पड़ी हैं। उन्होंने मांग की कि भारत सरकार इन अस्थियों को गंगा में प्रवाह करने के लिए जल्दी वीजा जारी करे, ताकि इन लोगों को भी मोक्ष मिल सके।

नहीं मिला वीज़ा
पाकिस्तान के 10 हिंदुओं ने इस्लामाबाद स्थित भारतीय दूतावास से वीजा की मांग की थी, ताकि वह अपने परिजनों की अंतिम इच्छा के अनुसार उनकी अस्थियां गंगा में विसर्जित कर सकें, लेकिन किसी को भी पाकिस्तान सरकार ने वीजा नहीं दिया। रामनाथ मिश्रा के साथ उनका भतीजा कबीर भारत आया, जो अस्थियों के विसर्जन के समय धार्मिक परंपराएं पूरी करेगा।

घर में भी बना लेते हैं समाधि
पाकिस्तान में हिंदू लोग या तो अस्थियों को मंदिर में संभाल कर रख लेते हैं या अपने घर में ही समाधि बना लेते हैं। उन्होंने बताया कि कुछ लोग अब समुद्र में ही अस्थियों का विसर्जन करने लगे हैं। वहां हिंदू आमतौर पर अपनी आस्था के अनुसार सिंधु नदी में भी अस्थि विसर्जन कर दिया करते हैं।

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